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Saturday, April 05, 2008

ख़याल करना...

ख़याल करना बहुत ज़रूरी है मिस्टर अवस्थी
इसमे इलाज की शक्ति है...
एक मरहम है जिस से दर्द मिटता है,
बच्चे को तस्सली हो जाती है की उसका कोई ख़याल करता है,
एक आध झप्पी, प्यार भरी पपपी...
ये दिखाने को की मैं ख़याल करता हूँ,
बेटा मैं तुम से प्यार करता हूँ,
अगर कोई फ़िक्र है तो मेरे पास आओ,
क्या हुआ जो तुम फिसले गलती हुई,
मैं हूँ ना...
ये दिलासा...
ख़याल करना... ख़याल करना इसी को कहते हैं न मिस्टर अवस्थी?
- तारे ज़मीन पर

तरुण चंदेल
ज़िंदगी, सीख और टेक्नोलॉजी

Monday, March 24, 2008

हमारी भाषा ...

लेकिन आज तो हमारी भाषा ही खारी हो चली है जिन सरल, सजल शब्दों की धारों से वह मीठी बनती थी, उन धारों को बिलकुल नीरस, बनावटी, पर्यावारानीय, पारिस्थितिक जैसे शब्दों से बांधा जा रह है अपनी भाषा, अपने ही आँगन में विस्थापित हो रही है, वह अपने ही आँगन में परायी बन रही है
- अनुपम मिश्र


तरुण चंदेल
ज़िंदगी, सीख और टेक्नोलॉजी